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2 साल की हुई AAP, सफर पर एक नजर
26 November, 2014
Arvind Kejriwal
दिल्ली की राजनीति को जिस पार्टी ने बदलकर रख दिया, वह आज ही के दिन बनी थी. जी हां, अन्ना आंदोलन की कोख से निकली आम आदमी पार्टी आज दो साल की हो गई है. अपने दूसरे जन्मदिन पर पार्टी ने तालकटोरा स्टेडियम में महिला सुरक्षा के मुद्दे पर 'वुमन डायलॉग' बुलाया है.

राजधानी में चुनाव की आमद के बीच AAP के सफर पर एक नजर:

राजनीतिक पार्टियों आलोचना का शिकार होना तो लाजमी है. लेकिन इस पहलू को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि AAP उन सवालों को राजनीति के केंद्र पर लाई जो लंबे समय से हाशिये पर पड़े थे. इसमें 'मैंगो पीपल' से जुड़े मुद्दे तो थे ही, राजनीतिक पारदर्शिता और वीआईपी कल्चर के खिलाफ सख्त रुख भी था. दावा स्वराज और भ्रष्टाचारमुक्त शासन का था और चेहरा ईमानदार छवि के अरविंद केजरीवाल का था. नतीजा 8 दिसंबर 2013 को जब दिल्ली विधानसभा चुनाव के नतीजे आए, तो सारे आकलन ध्वस्त हो गए. एक साल पुरानी पार्टी ने 28 सीटें जीत ली थीं. दिल्ली की सड़कों पर झाड़ू लहरा रही थी.

अरविंद केजरीवाल ने जब जनता के सामने मुख्यमंत्री पद शपथ ली , तो हिंदुस्तान की सियासत ने एक अलग तरह की राजनीतिक ताकत को महसूस किया. शपथ ग्रहण में 'इंसान का इंसान से हो भाईचारा' गाता मुख्यमंत्री, भारत ने पहले नहीं देखा था. ये आम आदमी की ताकत थी. ये आम आदमी पार्टी की पहली और सबसे बड़ी जीत थी.

दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल एक बार फिर दिल्ली की सत्ता हासिल करने की तैयारी कर रहे हैं. अपने पहले चमत्कार को दोहराने की रणनीति पर काम चल रहा है. मगर, क्या ये मिसाल कायम रह पाएगी. क्या आम आदमी पार्टी एक बार फिर अपनी जीत को दोहरा सकेगी? क्या केजरीवाल दिल्ली की सियासत के सबसे बड़े सुपरमैन साबित होंगे? इन सवालों का जवाब जानने के लिए थोड़ा फ्लैश बैक में चलना होगा.

सिलसिला जहां से शुरू हुआ...
26 नवंबर 2012. यही वो तारीख है, जब राष्ट्रभक्ति और आम आदमी की ज़िंदगी बेहतर बनाने के जुनून के साथ शुरू हुआ था आम आदमी पार्टी का सफर. भ्रष्टाचार की जंजीरों में जकड़ते जा रहे देश को बचाने के लिए सड़क से लेकर सरकारी दफ्तरों तक रोज़मर्रा के छोटे-बड़े करप्शन से जंग लड़ती जनता. लोकपाल के दम पर पूरे देश को भ्रष्टाचार के जाल से मुक्त कराने का सपना. तो यहां से शुरू हुआ था यह सफर. जनलोकपाल आंदोलन से लेकर आम आदमी पार्टी तक और पहले चुनाव से लेकर दिल्ली की सत्ता हासिल करने तक. ये सियासी सफर किसी सपने के सच होने जैसा है.

मगर, ये सपना कई बार टूटते-टूटते बचा, तो कई मायनों में बिखरने भी लगा. दिल्ली समेत पूरे देश की राजनीति में एक नई तरह की सियासत शुरू करने वाली पार्टी का हर पहलू काफी दिलचस्प है. फाउंडेशन डे यानी स्थापना दिवस के मौके पर आम आदमी पार्टी की बुनियाद से लेकर बुलंदी तक पहुंचने की पूरी कहानी आपको बताते हैं.

अन्ना का अर्जुन, केजरीवाल
अरविंद केजरीवाल और अन्ना हजारे. एक पूर्व ब्यूरोक्रेट तो दूसरा सशक्त आंदोलनकारी. एक द्रोणाचार्य तो दूसरा उनका अर्जुन. दोनों ने मिलकर एक ऐसे मुद्दे को राजनीतिक हथियार बनाया, जिसके निशाने पर देश की तमाम पार्टियां थीं. करप्शन के ख़िलाफ लड़ाई ही आम आदमी पार्टी की बुनियाद है. मगर, किसी को नहीं मालूम था कि आंदोलन की परिणति सियासी पार्टी के रूप में सामने आएगी और अन्ना वीके सिंह (जो अब एनडीए सरकार में मंत्री हैं) और संतोष भारतीय को साथ लेकर केजरीवाल से अलग हो जाएंगे.

आम आदमी पार्टी की नींव तो उसी दिन तैयार होने लगी थी, जब अगस्त 2011 में जंतर-मंतर पर अन्ना और केजरीवाल समेत उनकी पूरी टीम ने आंदोलन शुरू किया था. इंडिया अगेंस्ट करप्शन, यानी भ्रष्टाचार के ख़िलाफ भारत के लोगों की लड़ाई. इसी आंदोलन को लेकर अन्ना के साथ केजरीवाल, किरण बेदी, प्रशांत भूषण, शांति भूषण जैसे अपने-अपने क्षेत्र की मशहूर हस्तियां एक मंच पर आईं. अन्ना सिर्फ आंदोलन के समर्थक थे. अनशन उनकी सबसे बड़ी ताक़त है, इसलिए वो शुरू से सिर्फ आंदोलन के दम पर अपनी मांगें मनवाने की कोशिश कर रहे थे.

(आगे के पन्नों पर पढ़ें, राजनीति में आने के लिए केजरीवाल ने क्या तर्क दिया था.)


'कीचड़ में जाए बिना सफाई कैसे होगी'
जनलोकपाल आंदोलन को लेकर जंतर-मंतर से शुरू हुआ आंदोलन दिल्ली के रामलीला मैदान तक पहुंचा. तत्कालीन यूपीए सरकार से जनलोकपाल कानून बनाने के मुद्दे पर कई बार टकराव हुआ. यूपीए सरकार ने उस वक्त तमाम वादे किए, लेकिन हर बार अन्ना और उनके साथियों को लगा कि जनता के साथ धोखा हो रहा है. खुद बीजेपी और नरेंद्र मोदी इस आंदोलन के साथ थे. बहरहाल, जनलोकपाल बिल तो नहीं पास हुआ, लेकिन केजरीवाल और अन्ना की राहें अलग होने की नींव तैयार हो गई.

एक तर्क था कि राजनीति के कीचड़ में नहीं जाना है. पर जवाबी तर्क था कि कीचड़ में घुसे बिना सफाई कैसे होगी. फिर दिग्विजय सिंह सरीखे नेताओं की 'राजनीति में आकर दिखाओ' जैसी चुनौती भी थी. लिहाजा केजरीवाल ने एक साहसिक फैसला लिया. सोशल नेटवर्किंग साइट समेत प्रचार के तमाम आधुनिक साधनों के दम पर उन्होंने एक मास्टरप्लान तैयार किया. जनलोकपाल आंदोलन शुरू होने के करीब एक साल बाद अक्टूबर 2012 में अन्ना की जगह केजरीवाल ने जनलोकपाल को लेकर अनशन शुरू किया . तत्कालीन यूपीए सरकार ने केजरीवाल के अनशन की परवाह नहीं की. केजरीवाल ने कहा कि राजनीतिक सिस्टम का हिस्सा बनकर ही जनता को उनका हक दिलाया जा सकता है. जनलोकपाल बिल अगर लाना है, तो उसके लिए सियासी पार्टी बनानी होगी. अन्ना इसके बिल्कुल खिलाफ थे. केजरीवाल के सामने दिल्ली के रामलीला मैदान में हज़ारों लोग बैठे थे. अन्ना से अलग होकर पार्टी बनाने का फैसला उन्हें लेना ही पड़ा. 2 अक्टूबर 2012 को केजरीवाल ने अनशन वाले मंच से ही पार्टी बनाने का ऐलान कर दिया. पार्टी के गठन की तारीख तय हुई, 26 नवंबर. क्योंकि, यही वह दिन था, जब 1949 में संविधान को अपनाया गया था.

अंतत: अलग हुए अन्ना
26 नवंबर 2012 को अन्ना और केजरीवाल के रास्ते हमेशा के लिए अलग हो गए. अन्ना इंडिया अगेंस्ट करप्शन के दम पर अपनी जंग जारी रखने की राह पर चल पड़े. वही इंडिया अगेंस्ट करप्शन जिसके फेसबुक पेज ने भी विचारों के स्तर पर तेजी से पलटी मारी और जब खुले तौर पर बीजेपी के पक्ष में और AAP के खिलाफ कंटेंट पोस्ट करता है. खैर, केजरीवाल ने पार्टी बनाई और सत्ता संघर्ष के मैदान में कूद पड़े. उन्होंने सोशल मीडिया से लेकर प्रचार के तमाम माध्यमों के ज़रिए पार्टी के लिए नाम का सुझाव मांगा. दिल्ली वालों ने केजरीवाल की टोपी पर आम आदमी देखकर नाम दिया, आम आदमी पार्टी. सबको ये नाम बेहतर लगा और 26 नवंबर 2012 को बन गई एक नई पार्टी. आम आदमी पार्टी. चेहरा बने अरविंद केजरीवाल. अब केजरीवाल के सामने कई चुनौतियां थीं. एक साल बाद होने वाले दिल्ली विधानसभा के चुनाव में अपना वजूद साबित करना.. और उससे पहले दिल्ली की जनता का दिल जीतना. ये दोनों ही चीज़ें आसान नहीं थीं.

आम आदमी पार्टी और केजरीवाल का पहला चुनाव था. 2012 में पार्टी बनी और 2013 में दिल्ली के चुनावी संग्राम में पार्टी अपनी जगह बनाने के लिए संघर्ष कर रही थी. केजरीवाल की राजनीति को कांग्रेस, बीजेपी समेत सभी पार्टियों ने शुरुआती तौर पर खारिज करने की कोशिश की. विरोधी दलों ने ये कहना शुरू कर दिया कि एक ही चुनाव में आम आदमी पार्टी और उनके नेताओं को राजनीति की मुश्किलों का अंदाज़ा हो जाएगा.. पार्टी पहले ही चुनाव के बाद ख़त्म हो जाएगी.

(आगे के पन्नों पर पढ़ें: चुनाव नतीजे का वह ऐतिहासिक दिन)


और 8 दिसंबर 2013 का वह दिन...
केजरीवाल और उनके राजनीतिक साथियों के लिए 2013 का दिल्ली विधानसभा चुनाव अग्निपरीक्षा की तरह था. पार्टी ने दिल्ली की सभी 70 सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला किया. मगर, इसी बीच केजरीवाल ने एक और बड़ा फैसला कर लिया. उन्होंने नई दिल्ली सीट से लड़ने का ऐलान किया. इस सीट पर दिल्ली की तत्कालीन मुख्यमंत्री और 15 साल से लगातार काबिज़ रहने वाली शीला दीक्षित लड़ रही थीं. लोगों को लगा कि केजरीवाल ने बड़ी राजनीतिक भूल कर दी है.मगर, वो अपने फ़ैसले पर अडिग रहे और शीला सरकार के दौरान तमाम तरह के करप्शन के आरोपों को सियासी प्रचार का हिस्सा बनाते रहे.

जब चुनाव के नतीजे आए, तो दिल्ली की सियासत पूरी तरह बदल गई. मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को केजरीवाल ने नई दिल्ली सीट से बुरी तरह हराया और सत्तारूढ़ रही कांग्रेस 8 सीटों के साथ तीसरे पायदान पर पहुंच गई. 15 साल का कांग्रेस का शासन नई नवेली पार्टी ने खत्म कर दिया. कांग्रेस को जितना भी नुकसान हुआ, सब आम आदमी पार्टी की वजह से था. कांग्रेस के नेता ज्यादातर सीटों पर तीसरे पायदान पर चले गए. कांग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा और बीजेपी भी बहुमत से चार सीटें पीछे रह गई. सस्ती बिजली और मुफ्त पानी के साथ-साथ भ्रष्टाचार मुक्त दिल्ली बनाने का वादा काम कर गया. आम आदमी पार्टी को 28 सीटें मिलीं. दिल्ली के सियासी इतिहास में ऐसा पहले कभी नहीं हुआ. सिर्फ एक साल पुरानी पार्टी को पहले ही चुनाव में 28 सीटें कभी नहीं मिलीं.

कांग्रेस का बाहरी समर्थन और विवाद
केजरीवाल और उनके साथियों के लिए ये जश्न का वक्त था. क्योंकि, सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद बीजेपी ने सरकार बनाने से इनकार कर दिया और कांग्रेस किसी भी सूरत में सरकार नहीं बना सकती थी. बीजेपी को रोकने के लिए कांग्रेस ने उपराज्यपाल को चिट्ठी लिखी, कि अगर आम आदमी पार्टी सरकार बनाती है तो कांग्रेस उसे बिना शर्त समर्थन को तैयार है. 'शासन का अनुभव न होने की वजह से आम आदमी पार्टी सरकार बनाने से डर रही है', ऐसे कुछ बयान आए. AAP ने सरकार बनाने का फैसला किया. केजरीवाल ने विधानसभा में हर पार्टी के विधायक को विश्वास प्रस्ताव का समर्थन करने की अपील की. बीजेपी को साथ नहीं देना था, लेकिन कांग्रेस के आठों विधायकों और जेडीयू के एकमात्र विधायक ने AAP के पक्ष में वोट किया और सरकार को बहुमत मिल गया.

जो लोग केजरीवाल को ख़ारिज कर रहे थे, वो उन्हें रामलीला मैदान में शपथ लेते हुए देखते रह गए . 28 दिसंबर 2013 को केजरीवाल ने कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनाई. दिल्ली के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर रहते हुए केजरीवाल ने सस्ती बिजली और मुफ्त पानी का वादा निभाया. लोगों को करप्शन से मुक्ति दिलाने के लिए स्टिंग ऑपरेशन की सलाह दी, हेल्पलाइन शुरू की और हर शिकायत पर फौरन कार्रवाई का वादा किया. गैर-पारंपरिक राजनीतिक शैली में कुछ तेज-तर्रार फैसले किए. इसके बाद आम आदमी पार्टी ने जनलोकपाल बिल को पास करवाने का फैसला किया. ये वो मुद्दा है, जिसे लेकर केजरीवाल ने आंदोलन से सत्ता तक का सफ़र तय किया था. 14 फरवरी 2014 को केजरीवाल ने विधानसभा में कह दिया कि अगर लोकपाल बिल पर चर्चा नहीं होने दी जाएगी तो वो इस्तीफा दे देंगे.


केजरीवाल ने छोड़ी कुर्सी
ऐसा ही हुआ. जनलोकपाल बिल पर न कांग्रेस ने साथ दिया, न बीजेपी ने. अपना वादा पूरा न कर पाने की वजह से केजरीवाल ने सत्ता में बने रहना उचित नहीं समझा. भारी हंगामे के बीच केजरीवाल ने तय फैसले के मुताबिक इस्तीफा देने का ऐलान कर दिया. उन्होंने बीजेपी और कांग्रेस को ही इसके लिए ज़िम्मेदार ठहराया. मगर, विरोधियों ने कहा कि वो सीएम से सीधे पीएम बनने का सपना पूरा करने के लिए सत्ता छोड़कर भाग गए. केजरीवाल को आज भी इस मुद्दे पर सफाई देनी पड़ती है.

केजरीवाल ने सत्ता छोड़ने के बाद नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ वाराणसी से लोकसभा का चुनाव भी लड़ा. मगर, हार गए. लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी को अपेक्षित सफलता नहीं मिली, लेकिन पंजाब से उन्हें चार सांसद जरूर मिले. AAP एक बार फिर दिल्ली की सियासत में सक्रिय हो गए. महाराष्ट्र और हरियाणा का चुनाव भी इसीलिए नहीं लड़ा, ताकि दिल्ली तक ही सीमित रहें. हालांकि, पार्टी के गठन से लेकर अब तक कई लोग उनसे अलग हो चुके हैं. शाज़िया इल्मी समेत पार्टी के कई चर्चित चेहरे एक-एक करके केजरीवाल से दूर हो चुके हैं. जो लोग दूर हुए, उनमें से कइयों की नजदीकियां बाद के दिनों में बीजेपी से बढ़ी हैं. अब एक बार फिर केजरीवाल ने नई दिल्ली से चुनाव लड़ने का ऐलान किया है. दिल्ली विधानसभा चुनाव के बाद लोकसभा चुनाव में मिली बड़ी हार के बाद राजधानी की सियासत में आम आदमी पार्टी की वापसी की राह उतनी आसान नहीं है, जितनी पहले थी. एक साल में यहां की राजनीतिक हवा में काफ़ी बदलाव आया है. अब केजरीवाल को पहले से बड़ी अग्निपरीक्षा देनी होगी.

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